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एक पेड़ मां के नाम… और सीतापुर के दरख़्त माफियाओं के नाम!”आखिर किसका संरक्षण प्राप्त ❓

एक पेड़ मां के नाम… और सीतापुर के दरख़्त माफियाओं के नाम!”

यूपी के माफिया बेलगाम, प्रशासन नतमस्तक?

पूरा सिस्टम खरीद लिया है!” — सूत्रों के मुताबिक माफियाओं का दावा

सीतापुर के चलता, में जय अम्बे धर्मकांटा के समीप बतौली के मंगारी शुवारपारा में संचालित अवैध डिपो ।

सीतापुर, सरगुजा:
जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “एक पेड़ मां के नाम” लगाने की अपील कर रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ के सरगुजा में ‘हरियाली की हत्या’ खुलेआम हो रही है। सीतापुर वनपरिक्षेत्र में नीलगिरी और यूकलिप्टस के पेड़ों की आड़ में उत्तर प्रदेश से आए लकड़ी माफिया बेलगाम हो चुके हैं। राजस्व की भूमि बता कर बिना अनुमति के पेड़ों की अवैध कटाई कर, ट्रैक्टर, ट्रॉली और हाइड्रा पंजा के ज़रिए भारी मात्रा में लकड़ी का स्टॉक कर उत्तर भारत के अन्य राज्यों में सप्लाई किया जा रहा है।



प्रशासन मौन क्यों ?
क्या प्रशासन पर कोई दबाव है ?
या मिलीभगत की मलाई में सब कुछ दबा दिया गया है ?

प्रशासन की निष्क्रियता अब सवालों के घेरे में है। सीतापुर के चलता बतौली के मंगारी और चलता धर्मकांटा के पास बाउंड्री के भीतर बड़े स्तर पर अवैध डिपो संचालित हो रहे हैं। मगर अब तक किसी भी ट्रैक्टर या हाइड्रा पंजा को जब्त करने की साहसिक कार्यवाही नहीं हो पाई है।



सीतापुर राजस्व जमीन पर अवैध डिपो, और अधिकारी बेखबर ?

सीतापुर वन परिक्षेत्र राजस्व के अंतर्गत कई अवैध डिपो चल रहे हैं। बिना अनुमति के कटाई और स्टॉकिंग का सिलसिला महीनों से जारी है। फिर भी न तो कोई FIR, न कोई सीलिंग, और न ही कोई ठोस कार्यवाही।

सवालों की बौछार:

आखिर क्यों यूपी के माफिया के आगे नतमस्तक है प्रशासन?

क्या इन माफियाओं को अंदरूनी संरक्षण प्राप्त है?

बार-बार खबरें प्रकाशित होने के बावजूद अब तक क्यों नहीं हुई कड़ी कार्यवाही?

मीडिया जागरूक, प्रशासन लाचार!

प्रिंट, डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बार-बार इस मुद्दे को उजागर कर रही है। परंतु अब तक प्रशासन की ओर से सिर्फ खानापूर्ति ही देखने को मिली है। माफिया अब इतने बेखौफ हो चुके हैं कि खुलेआम लकड़ी लोड करते हैं, और अधिकारी आंख मूंदकर तमाशा देख रहे हैं।

अब देखना है कि प्रशासन नींद से कब जागेगा?
क्या ट्रैक्टर, ट्रॉली, हाइड्रा और अवैध लकड़ी को ज़ब्त किया जाएगा या फिर कागज़ों की चालबाज़ी से ही मामला रफा-दफा कर लिया जाएगा ?

“पूरा सिस्टम खरीद लिया है!” — सूत्रों के मुताबिक माफियाओं का दावा

जब माफिया खुद यह कहने लगे कि “पूरा सिस्टम हमारे जेब में है”, तो समझा जा सकता है कि कानून की पकड़ कितनी ढीली पड़ चुकी है।
सूत्रों की मानें तो अवैध लकड़ी कारोबार में लिप्त माफिया खुलेआम दावा कर रहे हैं कि उन्होंने सिस्टम को “खरीद” लिया है — शायद यही वजह है कि अब कार्यवाही भी भगवान भरोसे छोड़ दी गई है।

जहां पुलिस राजस्व और वन विभाग को सख्ती से काम करना चाहिए था, वहीं अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं। ना कोई रेड, ना जब्ती, और ना ही दोषियों पर कानूनी शिकंजा।

✅ 1. तत्काल छापा मार कार्रवाई (रेड):

अवैध डिपो, स्टॉक यार्ड और संचालित गाड़ियों पर फोर्स के साथ रेड डालना।

माफिया के अड्डों पर छापेमारी कर सबूत जुटाना और मौके पर जब्ती।


✅ 2. ट्रैक्टर, ट्रॉली, हाइड्रा और वाहन जब्त करना:

जिन गाड़ियों से अवैध परिवहन हो रहा है, उन्हें सीज कर वन अधिनियम की धाराओं में जब्ती।

RTO व वन विभाग के संयुक्त ऑपरेशन के ज़रिए।


3. FIR दर्ज कर IPC और वन अधिनियम की धाराओं में केस बनाना:

वन अपराध अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act) की धाराओं के तहत कार्रवाई।

आरोपियों पर गंभीर गैर-जमानती धाराएं लगाकर गिरफ्तारी।


✅ 4. राजस्व व वन भूमि की सीमा जांच और अतिक्रमण हटाना:

जिन ज़मीनों पर डिपो या गोदाम बने हैं, उनका राजस्व व वन भूमि से मिलान।

अवैध कब्जा होने पर अतिक्रमण हटाना।


✅ 5. नेताओं के नाम के दुरुपयोग पर कानूनी नोटिस/जांच:

यदि माफिया नेताओं का नाम लेकर प्रशासन को डराने की कोशिश कर रहे हैं, तो यह मानहानि और भ्रम फैलाने का मामला है – इसकी जांच और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।


✅ 6. वन अधिकारी और स्थानीय पुलिस की ज़िम्मेदारी तय करना:

लापरवाही पर संबंधित अफसरों को कारण बताओ नोटिस।

निलंबन, जांच या ट्रांसफर जैसे अनुशासनात्मक एक्शन।


✅ 7. मीडिया के साथ संयुक्त सूचना प्रणाली बनाना:

मीडिया रिपोर्ट्स को गंभीरता से लेते हुए हर सूचना की जांच।

नियमित ब्रीफिंग कर जनता को विश्वास में लेना।


???? यदि यह सब नहीं होता है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, मिलीभगत की बू है।

Shaif firdousi
Author: Shaif firdousi

KTUJM से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की उपाधि प्राप्त !

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