
अंबिकापुर/बरगीड़ीह | SNT NEWS :
पवित्र पाक माह रमज़ान रहमत, बरकत और इबादत का महीना माना जाता है। इसी कड़ी में बरगीड़ीह स्थित जामा मस्जिद बरगीड़ीह में रोज़ेदारों ने सामूहिक रूप से रोज़ा इफ्तार किया। मगरिब की अज़ान के साथ ही रोज़ेदारों ने खजूर, फल एवं अन्य व्यंजनों से रोज़ा खोला और मगरिब की नमाज़ अदा की।
दावत-ए-इफ्तार (दावत-ए-आम)
नमाज़ के बाद डॉ॰ फैज़ुल हसन फिरदौसी के निजी निवास पर सपरिवार दावत-ए-इफ्तार (दावत-ए-आम) का आयोजन किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में रोज़ेदार, बुजुर्ग, युवा तथा क्षेत्र के गणमान्य लोग उपस्थित रहे। सभी ने एक साथ रोज़ा खोलकर मुल्क में अमन-चैन, तरक्की और समाज में आपसी भाईचारे के लिए दुआ मांगी।
रविवार की शाम आयोजित इस इफ्तार पार्टी में सैकड़ों रोज़ेदारों और अकीदतमंदों ने शिरकत की। रोज़ा खोलने के बाद सभी ने मिलकर नमाज़ अदा की और देश में अमन-चैन, खुशहाली तथा आपसी सौहार्द के लिए दुआएं मांगी। इस दौरान लोगों ने एक-दूसरे को रमज़ान की मुबारकबाद भी दी।

बताया गया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी रमज़ान के मुकद्दस महीने में इस तरह के इफ्तार कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। रमज़ान का यह पाक महीना सब्र, इबादत, इंसानियत और जरूरतमंदों की मदद करने का पैगाम देता है। ऐसे आयोजनों से समाज में भाईचारे और एकता की भावना और मजबूत होती है।
इससे पहले भी क्षेत्र में रोज़ेदारों के लिए कई इफ्तार कार्यक्रम आयोजित किए गए। तुबा टीम लोंगुटिया ग्रुप, हाजी यासीन फिरदौसी और काज़िम फिरदौसी अन्य लोगों के द्वारा भी दावत-ए-इफ्तार का आयोजन कर रोज़ेदारों की खिदमत की गई।

इफ्तार कार्यक्रम के दौरान फिरदौसी हॉस्पिटल के संचालक डॉ॰ फैज़ुल हसन फिरदौसी के साथ उनके भाई ऐनुल हसन फिरदौसी और जैनुल हसन फिरदौसी सहित परिवारजनों एवं अजीजों ने आए हुए मेहमानों की मेहमाननवाज़ी की। सभी मेहमानों के लिए इफ्तार और भोजन की बेहतर व्यवस्था की गई थी।

रमज़ान के इस बरकत भरे महीने में आयोजित ऐसे कार्यक्रम समाज में आपसी मोहब्बत, भाईचारे और एकता का संदेश दे रहे हैं।
रोज़ा क्यों रखा जाता है – मुख्य कारण:
तक़वा (परहेज़गारी) हासिल करना – रोज़ा इंसान को बुराइयों से दूर रहने और अल्लाह के करीब होने की सीख देता है।
सब्र और आत्मसंयम – पूरे साल इंसान खाना-पीना करता है, लेकिन रमज़ान में दिन भर भूखा-प्यासा रहकर अपने नफ़्स (इच्छाओं) पर काबू करना सीखता है।
गरीबों का एहसास – जब इंसान भूख और प्यास सहता है तो उसे उन लोगों का दर्द समझ आता है जो रोज़ाना भूखे रहते हैं, इसलिए दान और मदद की भावना बढ़ती है।
आत्मिक शुद्धि – रोज़ा सिर्फ पेट का नहीं बल्कि आँख, ज़ुबान और दिल का भी होता है, यानी बुरी बातों और गलत कामों से बचना।
अल्लाह का हुक्म – क़ुरआन में रोज़ा मुसलमानों पर फ़र्ज़ किया गया है, इसलिए इसे इबादत के तौर पर रखा जाता है।
इसी वजह से कहा जाता है कि “ग्यारह महीने इंसान अपनी जरूरतों के साथ जीता है, और रमज़ान का एक महीना उसे सब्र, इंसानियत और अल्लाह की याद का असली मतलब समझाता है।” 🤲
Author: SNT NEWS
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