
कलेक्टर का आदेश बेअसर, मंडल संयोजक की कुर्सी पर सात महीने से सस्पेंस
27 फरवरी को तत्काल कार्यभार बदलने का आदेश, सितंबर तक अमल का इंतजार, ओड़गी में प्रशासनिक आदेशों की अनदेखी पर उठे गंभीर सवाल
Rajesh Gupta सूरजपुर/:– जिले के ओड़गी जनपद पंचायत में कलेक्टर कार्यालय (आदिवासी विकास) से जारी एक प्रशासनिक आदेश के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 27 फरवरी 2026 को जारी आदेश में प्रभारी मंडल संयोजक का कार्यभार तत्काल प्रभाव से बदलने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन करीब सात महीने बाद भी आदेश के अनुरूप कार्रवाई हुई या नहीं, इसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में प्रशासनिक आदेशों के क्रियान्वयन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
कार्यालय कलेक्टर (आदिवासी विकास) सूरजपुर द्वारा 27 फरवरी 2026 को आदेश क्रमांक 4257/स्था./आदि.वि./2024-25 जारी किया गया था। दस्तावेज के अनुसार, ओड़गी विकासखंड के छात्रावासों, आश्रमों एवं विभागीय कार्यों के सुचारू संचालन के लिए रूपलाल मिरी, अधीक्षक श्रेणी ‘स’, प्री.मै.बा. छात्रावास ओड़गी को आगामी आदेश तक प्रभारी मंडल संयोजक, जनपद पंचायत ओड़गी के रूप में कार्य करने के लिए आदेशित किया गया था। आदेश में इसे तत्काल प्रभावशील बताया गया था।
इसी आदेश के बिंदु क्रमांक 8 में तत्कालीन प्रभारी मंडल संयोजक मनोहर लाल गुप्ता को उनके मूल पदस्थ संस्था पूर्व माध्यमिक शाला दवना, विकासखंड ओड़गी के लिए तत्काल कार्यमुक्त किए जाने का उल्लेख किया गया था। इसके बावजूद आरोप है कि आदेश जारी होने के करीब सात महीने बाद भी कार्यभार परिवर्तन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

सवाल यह है कि जब आदेश तत्काल प्रभावशील था, तो उसके पालन में इतनी लंबी देरी क्यों हुई? क्या इस अवधि में कोई संशोधित आदेश, स्थगन आदेश अथवा अन्य प्रशासनिक निर्देश जारी किया गया? यदि ऐसा कोई आदेश जारी हुआ है तो उसका रिकॉर्ड स्पष्ट होना चाहिए। वहीं यदि ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ, तो मूल आदेश के क्रियान्वयन में देरी की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
दस्तावेज के अनुसार कलेक्टर कार्यालय से जारी आदेश की प्रतिलिपि आयुक्त, आदिम जाति विकास रायपुर, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत सूरजपुर, जिला शिक्षा अधिकारी और विकासखंड शिक्षा अधिकारी ओड़गी सहित संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई थी। इसके बावजूद आदेश के धरातल पर पालन को लेकर सवाल उठना प्रशासनिक व्यवस्था और जवाबदेही के लिहाज से गंभीर विषय माना जा रहा है।
मामले को लेकर क्षेत्र में अब यह चर्चा भी तेज है कि आखिर जिला स्तर से जारी आदेश के बावजूद कार्यभार हस्तांतरण क्यों नहीं हुआ। यदि किसी सक्षम अधिकारी के स्तर से बाद में आदेश में बदलाव किया गया था, तो उसकी जानकारी संबंधित रिकॉर्ड में स्पष्ट रूप से होनी चाहिए। वहीं यदि कोई संशोधित अथवा स्थगन आदेश नहीं हुआ, तो सात महीने तक मूल आदेश के अनुपालन में देरी कैसे हुई, यह जांच का विषय बन गया है।
क्षेत्रवासियों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि कलेक्टर कार्यालय के मूल आदेश, कार्यभार हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेज, किसी संभावित संशोधित अथवा स्थगन आदेश तथा संबंधित अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई के रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। जांच में यदि आदेश की जानबूझकर अवहेलना अथवा किसी प्रकार की प्रशासनिक अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब मामला केवल मंडल संयोजक के कार्यभार का नहीं रह गया है, बल्कि यह जिला प्रशासन के आदेशों की प्रभावशीलता और उनके क्रियान्वयन की निगरानी से भी जुड़ गया है। जब आदेश में तत्काल कार्रवाई के निर्देश थे, तो सात महीने बाद भी स्थिति सवालों में क्यों है? इस सवाल का जवाब अब संबंधित विभागीय रिकॉर्ड और जिला प्रशासन की अगली कार्रवाई से ही सामने आएगा।













