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संपादकीय -छत्तीसगढ़ में जल–जंगल–ज़मीन बनाम ताक़त : विकास के नाम पर हिंसा और लूट कब तक?”

छत्तीसगढ़ में जल–जंगल–ज़मीन बनाम ताक़त : विकास के नाम पर हिंसा और लूट कब तक ❓️
SHAIF FIRDOUSI SNTNEWSछत्तीसगढ़ आज एक गहरे और चिंताजनक दौर से गुजर रहा है। एक ओर कॉरपोरेट हितों के नाम पर राज्य की अमूल्य खनिज संपदा को निकालने की होड़ मची है, तो दूसरी ओर आम जनता—खासकर आदिवासी और ग्रामीण—अपने हक़ की लड़ाई लड़ते हुए लाठियाँ खा रहे हैं, मुकदमे झेल रहे हैं और कई बार जान तक गंवाने को मजबूर हो रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि विकास किसके लिए और किसकी कीमत पर ?
सरगुजा के अंबिकापुर से करीब 15 किलोमीटर दूर खनन को लेकर हुआ हालिया संघर्ष इस सच्चाई को उजागर करता है। ग्रामीणों के कड़े विरोध के बावजूद जब खदान थोपने की कोशिश की गई, तो हालात पत्थरबाज़ी तक पहुंच गए। इस झड़प में ग्रामीणों के साथ एक महिला पुलिसकर्मी भी घायल हुई। यह घटना बताती है कि संवाद और सहमति की जगह जब बल प्रयोग ले लेता है, तो टकराव अवश्यंभावी हो जाता है।

इसी तरह रायगढ़ के तमनार में जल–जंगल–ज़मीन की लड़ाई और भी भयावह रूप में सामने आई। यहां विरोध की आड़ में कुछ असामाजिक तत्वों ने सारी मर्यादाएं लांघ दीं। भीड़ में शामिल हिंसक प्रवृत्ति के लोगों ने एक महिला आरक्षक की वर्दी तक फाड़ दी—जो न केवल कानून पर, बल्कि नारी सम्मान और मानवता पर सीधा हमला था। जान बचाकर भाग रही महिला आरक्षक को खेत में घेरकर अभद्रता की गई और इस शर्मनाक कृत्य का वीडियो बनाकर उसे वायरल किया गया। यह घटना छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे समाज के लिए शर्म का विषय है। पुलिस को मजबूरन 9 एफआईआर दर्ज कर संगीन धाराएं लगानी पड़ीं।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जल–जंगल–ज़मीन की लड़ाई और हिंसा में फर्क है। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसके नाम पर महिलाओं का अपमान, कानून को हाथ में लेना और भीड़तंत्र को बढ़ावा देना किसी भी सूरत में जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।


राज्य सरकार और प्रशासन को अब दो टूक फैसला लेना होगा। खनन और औद्योगिक परियोजनाओं से पहले ग्रामसभा की सहमति, पारदर्शिता और विश्वास बहाली अनिवार्य होनी चाहिए। वहीं, विरोध के बीच असामाजिक तत्वों की पहचान कर सख्ती से निपटना भी उतना ही जरूरी है, ताकि जनआंदोलन की पवित्रता बनी रहे और कानून का सम्मान भी।
छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी खनिज संपदा से नहीं, बल्कि उसके जंगलों, नदियों और वहां बसने वाले लोगों से है। अगर विकास के नाम पर इन्हीं लोगों को कुचला जाएगा, तो यह विकास नहीं, विनाश कहलाएगा। अब समय है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर यह तय करें—क्या छत्तीसगढ़ कॉरपोरेट मुनाफे का मैदान बनेगा, या अपने लोगों के हक़ और सम्मान का रक्षक?

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Author: SNT NEWS

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